गाजियाबाद कौशाम्बी बीट आरक्षी विनेश कुमार की सतर्कता ने खोला पाकिस्तान तक फैला जासूसी नेटवर्क, भोवापुर में गश्त के दौरान मिली एक सूचना से शुरू हुई जांच, 21 गिरफ्तारियों तक पहुंचा मामला ।

विनेश कुमार की सतर्क निगाह और बीट गश्त के दौरान मिली एक सूचना से शुरू हुई जांच, 21 गिरफ्तारियों तक पहुंचा मामला ।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 6 अप्रैल 2026 को जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी।

गाजियाबाद (दयाल शर्मा) कौशाम्बी थाना क्षेत्र के भोवापुर में तैनात मुख्य आरक्षी विनेश कुमार की सतर्क निगाह और बीट गश्त के दौरान मिली एक सूचना ने ऐसे नेटवर्क का पर्दाफाश कर दिया, जिसकी डोर सोशल मीडिया के जरिए सीमा पार पाकिस्तान तक जुड़ी थी। शुरुआत कुछ युवकों की संदिग्ध गतिविधियों और उनकी आर्थिक स्थिति से कहीं बेहतर जीवनशैली से हुई, लेकिन मोबाइल फोन की जांच ने मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रकरण में बदल दिया।

14 मार्च 2026 को भोवापुर बीट में तैनात मुख्य आरक्षी विनेश कुमार को गश्त के दौरान कुछ युवकों के बारे में सूचना मिली।  सूचना सामान्य लग सकती थी, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज नहीं किया। बीट स्तर पर की गई शुरुआती जांच में उनके मोबाइल फोन से रेलवे स्टेशनों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो मिले, जिन्हें कथित तौर पर अनजान नंबरों पर भेजा जा रहा था। पुलिस ने उसी दिन मुकदमा अपराध संख्या 76/2026 दर्ज कर छह लोगों को गिरफ्तार किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए साइबर क्राइम, स्वाट टीम और अभिसूचना शाखा को शामिल कर विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया।

गरीबी और आसान कमाई का लालच बना जाल। 

जांच में सामने आया कि नेटवर्क ने आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं और किशोरों को छोटे-छोटे काम देकर पहले उनका भरोसा जीता। भोवापुर के कई युवक मोबाइल मैकेनिक, पानी की बोतल पहुंचाने, बाइक रिपेयर और रेहड़ी जैसे छोटे काम करते थे।

नेपाल में रहने वाले एक युवक के जरिए उनकी बातचीत व्हाट्सऐप ग्रुप में ‘सरदार’ नाम से जुड़े व्यक्ति से शुरू हुई। पहले मामूली काम दिए गए और बाद में संवेदनशील स्थानों की रेकी तथा कैमरे लगाने जैसे काम सौंपे गए।

बताया गया कि दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन और सोनीपत रेलवे स्टेशन के पास सोलर पैनल से चलने वाले सिम-आधारित सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। इन कैमरों का रिमोट एक्सेस सीमा पार से संचालित होने की बात जांच में सामने आई। काम के बदले युवाओं को 500 रुपये से लेकर 15 हजार रुपये तक दिए जाते थे। भुगतान कभी डिजिटल माध्यम तो कभी नकद किया जाता था।

 

मीरा की कहानी ने खोली नेटवर्क की दूसरी परत।

जांच में मथुरा निवासी मीरा भी इस नेटवर्क की अहम कड़ी के रूप में सामने आई। कभी रिक्शा चलाने और पंखे ठीक करने का काम करने वाली मीरा आर्थिक परेशानियों के बीच सोशल मीडिया के जरिए गैंग के संपर्क में आई और बाद में हथियारों की सप्लाई से जुड़ गई। जांच के अनुसार, वह अलग-अलग शहरों में हथियार पहुंचाने और गिरोह के सदस्यों के बीच संपर्क कराने का काम करती थी। बाद में उसका संपर्क सीमा पार बैठे संचालकों से भी हुआ।

शादी का झांसा देकर हासिल की निजी जानकारी ।

नेटवर्क का एक और तरीका शाने इरम उर्फ महक के मामले से सामने आया। जांच के अनुसार, ‘सरदार’ नाम से संपर्क करने वाले व्यक्ति ने खुद को ‘अहमद रजा’ बताकर शादी का झांसा दिया। धीरे-धीरे उसने निजी तस्वीरें और वीडियो हासिल किए तथा परिवार के मोबाइल नंबर और ओटीपी जैसी जानकारियां भी हासिल कीं। वीडियो कॉल के दौरान पीछे पाकिस्तान का झंडा दिखाई देने पर उसे शक हुआ।

चार कार्रवाइयों में 21 गिरफ्तार

SIT की जांच आगे बढ़ने के साथ नेटवर्क की कई कड़ियां सामने आती गईं। 20 मार्च को नौ और आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें पांच नाबालिग बताए गए। 22 मार्च को गिरोह के मुख्य संचालक के रूप में नौशाद अली उर्फ लाला को पकड़ा गया। 24 मार्च को तीन और आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। चार अलग-अलग कार्रवाइयों में कुल 21 आरोपी गिरफ्तार किए गए, जिनमें 15 वयस्क और छह नाबालिग शामिल थे। पुलिस ने नौ मोबाइल फोन, दस सिम कार्ड और दो सोलर सीसीटीवी कैमरे बरामद किए। जांच में कैमरों का एक्सेस पाकिस्तान से जुड़े होने की बात सामने आई।

तीन स्तरों पर चलता था नेटवर्क।

जांच के मुताबिक गिरोह तीन स्तरों पर काम कर रहा था। सबसे ऊपर पाकिस्तान में बैठा ‘सरदार’ था, जो व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के जरिए निर्देश देता था। दूसरे स्तर पर बिचौलिए युवाओं की तलाश कर उन्हें नेटवर्क से जोड़ते और निर्देश पहुंचाते थे। तीसरे स्तर पर स्थानीय किशोरों और युवाओं का इस्तेमाल रेकी और कैमरे लगाने जैसे कार्यों के लिए किया जाता था।

जांच में ‘सरदार’ की पहचान पाकिस्तान के गैंगस्टर आबिद जट्ट उर्फ जोरा सिंह उर्फ अहमद रजा के रूप में किए जाने की बात सामने आई है। दस्तावेज के अनुसार, वह पाकिस्तान के अन्य गैंगस्टर शहजाद भट्टी के संपर्क में भी था।

UAPA के बाद NIA को सौंपी गई जांच।

मामले में देश-विरोधी गतिविधियों और विदेश में गोपनीय सूचनाएं भेजे जाने के पहलू सामने आने के बाद 24 मार्च 2026 को UAPA की धारा 18 जोड़ी गई। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 6 अप्रैल 2026 को जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी।

एक बीट आरक्षी की सतर्कता से खुला बड़ा राज।

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि बड़े नेटवर्क का सुराग किसी बड़े ऑपरेशन से नहीं, बल्कि बीट गश्त के दौरान मुख्य आरक्षी विनेश कुमार को मिली स्थानीय सूचना से मिला। एक बीट आरक्षी ने युवकों की गतिविधियों को गंभीरता से लिया, जांच आगे बढ़ाई और मामला धीरे-धीरे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं तक पहुंच गया।

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