तमिलनाडु के महाबलीपुरम से शुरू होकर बिहार के गोपालगंज तक पहुंची एक पत्थर की यात्रा महज एक परिवहन का कार्य नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत में आस्था, धैर्य और प्राचीन शिल्पकला के पुनर्जागरण का प्रतीक है। विश्व के सबसे विशाल शिवलिंग का बिहार की धरती पर आगमन एक ऐसी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उपलब्धि है, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए कौतूहल और श्रद्धा का केंद्र बनी रहेगी।
शिल्प और साधना का संगम
इस 33 फीट ऊंचे और 210 मीट्रिक टन वजनी शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘मोनोलिथ’ (एक ही पत्थर से निर्मित) होना है। ब्लैक ग्रेनाइट के एक विशाल खंड को तराश कर उसे शिव के स्वरूप में ढालना कोई सामान्य कार्य नहीं था। दक्षिण भारत के शिल्पकारों ने जिस निरंतरता के साथ 10 वर्षों तक अपनी छैनी और हथौड़ी से इस पर काम किया, वह उनकी अटूट साधना को दर्शाता है। शिवलिंग की सतह पर उकेरे गए 1008 सहस्त्रलिंगम न केवल इसकी दिव्यता को बढ़ाते हैं, बल्कि यह सूक्ष्म कलाकारी भारतीय मूर्तिकला की उस समृद्ध विरासत को भी जीवंत करती है, जो सदियों से हमारी पहचान रही है।
सांस्कृतिक सेतु का निर्माण
महाबलीपुरम (दक्षिण) से केसरिया (उत्तर) तक की यह यात्रा भारत की भौगोलिक सीमाओं को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोती है। 96 पहियों वाले विशेष वाहन पर सवार होकर जब यह शिवलिंग राज्यों की सीमाएं लांघते हुए बिहार पहुंचा, तो रास्ते भर उमड़ा भक्तों का हुजूम इस बात का प्रमाण है कि भारत का जनमानस आज भी अपनी जड़ों और आध्यात्मिक प्रतीकों से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह यात्रा आधुनिक इंजीनियरिंग और प्राचीन विश्वास का एक अनूठा समन्वय है।
बिहार के लिए गौरव का नया अध्याय
पूर्वी चंपारण के केसरिया में बन रहा ‘विराट रामायण मंदिर’ आने वाले समय में केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि स्थापत्य कला का एक वैश्विक मील का पत्थर साबित होगा। 1080 फीट की लंबाई और 270 फीट ऊंचे मुख्य शिखर के साथ यह मंदिर कंबोडिया के ‘अंगकोर वाट’ की भव्यता की याद दिलाता है। 17 जनवरी को होने वाली इस शिवलिंग की स्थापना बिहार के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक स्वर्णिम अध्याय लिखेगी। यह परियोजना धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और गौरव को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। स्थानीय निवासियों के चेहरे पर दिख रही खुशी और उत्सव का माहौल इस बात की पुष्टि करता है कि यह मंदिर जन-आस्था का नया केंद्र बनने जा रहा है।




