दयाल आश्रम मंडोली-सबोली खेड़ा में भव्य रथ यात्रा का आयोजन
देशभर से पहुंचे बाबा दयाल के अनुयायी, कलश यात्रा में महिला-पुरुषों और बच्चों ने बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा
नई दिल्ली। (दयाल शर्मा) मंडोली-सबोली खेड़ा स्थित दयाल आश्रम में बाबा दयाल (बाबा लोकनाथ) की भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक संदेश को समर्पित भव्य धार्मिक आयोजन किया गया। 12 सितंबर से 15 सितंबर तक चले इस चार दिवसीय कार्यक्रम में 24 घंटे का अखंड नाम कीर्तन, कलश यात्रा, भव्य रथ यात्रा सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और भक्ति कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों और शहरों से बाबा लोकनाथ के अनुयायी, श्रद्धालु और धर्मप्रेमी पहुंचे।
धार्मिक आयोजन के दौरान आश्रम और आसपास का क्षेत्र श्रद्धा और भक्ति के रंग में रंगा नजर आया। बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और बच्चों ने कलश यात्रा में उत्साहपूर्वक भाग लिया। श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए और बाबा लोकनाथ का स्मरण करते हुए यात्रा में शामिल हुए। कलश यात्रा के दौरान पूरा वातावरण धार्मिक जयघोष, भजनों और भक्तिमय ध्वनियों से गूंजता रहा।
आयोजन का प्रमुख आकर्षण भव्य रथ यात्रा रही। सजे-धजे रथ पर बाबा दयाल के स्वरूप तथा राधा-कृष्ण के स्वरूपों के दर्शन के लिए मार्ग में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। जगह-जगह लोगों ने रथ यात्रा का स्वागत किया और श्रद्धापूर्वक दर्शन किए। श्रद्धालुओं ने रथ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा प्रसाद ग्रहण किया। कई स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा कर धार्मिक यात्रा का स्वागत किया।

दयाल आश्रम में आयोजित 24 घंटे के अखंड नाम कीर्तन में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। कीर्तन और भजनों से आश्रम परिसर में आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालु देर तक भक्ति कार्यक्रमों में शामिल होते रहे और बाबा लोकनाथ के नाम का संकीर्तन करते रहे। आयोजकों ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य बाबा लोकनाथ के प्रेम, करुणा, गुरु-भक्ति, साधना और मानव सेवा के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है।
बाबा लोकनाथ का जीवन साधना और मानव सेवा का संदेश।
श्रद्धालुओं के अनुसार बाबा दयाल, जिन्हें बाबा लोकनाथ ब्रह्मचारी के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म वर्ष 1730 में कोलकाता के निकट बारासात क्षेत्र के चकला गांव में कमला देवी और रामनारायण घोषाल के परिवार में हुआ था। धार्मिक मान्यताओं और उनके जीवन-वृत्तांत के अनुसार बचपन से ही उनका झुकाव सांसारिक जीवन की अपेक्षा आध्यात्मिक साधना की ओर था। लगभग 11 वर्ष की आयु में उन्हें महान गृहस्थ योगी एवं वैदिक विद्वान भगवान गांगुली के संरक्षण में सौंपा गया। भगवान गांगुली ने लोकेनाथ और उनके सहपाठी बेनीमाधव को दीक्षा देकर योग, ध्यान, ब्रह्मचर्य और कठोर साधना के मार्ग पर अग्रसर किया।
जीवन-वृत्तांतों के अनुसार इसके बाद गुरु और शिष्य हिमालय की ओर रवाना हुए, जहां वर्षों तक कठोर साधना और आध्यात्मिक अभ्यास का क्रम जारी रहा। बाबा लोकनाथ के अनुयायियों की मान्यता है कि उन्होंने साधना के उच्चतम स्तर को प्राप्त किया और निर्विकल्प समाधि की अवस्था तक पहुंचे, जिसे ईश्वर या परम सत्य के साथ पूर्ण एकात्मता की अवस्था माना जाता है। 
बताया जाता है कि अपने गुरु की सेवा और उनके प्रति समर्पण को बाबा लोकनाथ ने जीवन का महत्वपूर्ण आधार बनाया। लोकनाथ के जीवन से जुड़ी कथाओं में गुरु-शिष्य संबंध को विशेष महत्व दिया गया है। आगे चलकर उन्होंने हिमालय की एकांत साधना तक सीमित रहने के बजाय जनसामान्य के बीच रहकर आध्यात्मिक संदेश देने और मानव सेवा का मार्ग अपनाया।
बरदी में स्थापित हुआ आश्रम।
बाबा लोकनाथ के जीवन से जुड़े विवरणों के अनुसार लगभग 1860 के दशक में वर्तमान बांग्लादेश के नारायणगंज जिले के बरदी गांव में एक स्थानीय जमींदार परिवार ने उनके रहने के लिए स्थायी आश्रम का निर्माण कराया। बरदी आश्रम धीरे-धीरे बाबा लोकनाथ के अनुयायियों के लिए प्रमुख श्रद्धा केंद्र बन गया। कहा जाता है कि बाबा ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों का महत्वपूर्ण समय यहीं बिताया और यहीं से उनके उपदेशों, आध्यात्मिक शिक्षाओं तथा मानव सेवा का संदेश दूर-दूर तक फैला।
श्रद्धालुओं के बीच यह भी मान्यता रही है कि बाबा लोकनाथ ने पैदल अनेक दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएं कीं। उनके जीवन से संबंधित विभिन्न कथाओं में मक्का, अफगानिस्तान, फारस, पश्चिमी देशों तथा उत्तरी ध्रुव तक की यात्राओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन यात्रा-विवरणों को उनके अनुयायी आध्यात्मिक परंपरा और जीवन-कथाओं के हिस्से के रूप में देखते हैं।
करुणा और प्रेम के लिए ‘दयाल बाबा’ नाम।
बाबा लोकनाथ को उनके अनुयायी प्रेम, करुणा और मानव सेवा की भावना के कारण श्रद्धापूर्वक ‘दयाल बाबा’ और ‘दयाल ठाकुर’ के नाम से संबोधित करते हैं। उनके अनुयायियों का मानना है कि बाबा ने जाति, धर्म, रंग या सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता को महत्व दिया। उनकी शिक्षाओं में श्रद्धा, आत्मविश्वास, प्रेम, करुणा, संयम और गुरु के प्रति विश्वास को विशेष स्थान दिया गया।
बाबा लोकनाथ से जुड़े अनेक भक्तिपरक प्रसंगों और जनश्रुतियों में उनके आशीर्वाद से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होने तथा कठिन परिस्थितियों में सहायता मिलने की बातें कही जाती हैं। उनके भक्त उन्हें ऐसे संत के रूप में स्मरण करते हैं, जिनका आश्रम सभी वर्गों और धार्मिक समुदायों के लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र रहा।
उनके जीवन से जुड़ी परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि वे गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों को आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताते थे। उन्होंने योग, ध्यान, आत्मसंयम और ईश्वर-भक्ति के माध्यम से सामान्य जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक साधना करने की प्रेरणा दी।
भक्त परंपरा में यह मान्यता भी प्रचलित है कि दिन में बाबा लोकनाथ आम लोगों की समस्याओं और प्रार्थनाओं को सुनते थे, जबकि रात में साधक और योगी उनसे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने आते थे। इन कथाओं के माध्यम से उनके अनुयायी उन्हें प्रेम और ज्ञान के ऐसे संत के रूप में याद करते हैं, जिनका जीवन साधना और लोककल्याण को समर्पित रहा।
महासमाधि और अमर संदेश।
श्रद्धालु परंपरा के अनुसार 2 जून 1890 को बाबा लोकनाथ ने 160 वर्ष की आयु में अपनी इच्छा से शरीर त्यागकर महासमाधि ली। उनके अंतिम समय से जुड़ी भक्तिपरक परंपरा में उनके कथन को विशेष रूप से स्मरण किया जाता है—“तुम कभी अकेले नहीं हो। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं।”
बाबा लोकनाथ के अनुयायियों का कहना है कि उनका यह संदेश आज भी श्रद्धालुओं के जीवन में विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का आधार बना हुआ है। उनके अनुसार बाबा का जीवन मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि सच्ची श्रद्धा, प्रेम, आत्मविश्वास, गुरु के प्रति समर्पण और मानव सेवा के माध्यम से व्यक्ति सत्य और आध्यात्मिकता के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
देशभर में जारी हैं धार्मिक आयोजन।
बाबा लोकनाथ की स्मृति और उनके संदेश को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उनके अनुयायियों और भक्तों द्वारा विभिन्न स्थानों पर मंदिर, आश्रम और धार्मिक केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन स्थानों पर नियमित रूप से भजन-कीर्तन, पूजा, रथ यात्रा, कलश यात्रा और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मंडोली-सबोली खेड़ा स्थित दयाल आश्रम में आयोजित इस चार दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम ने भी श्रद्धालुओं को बाबा लोकनाथ के जीवन, साधना और मानवतावादी संदेश से जोड़ने का कार्य किया। आयोजकों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं, सेवाभाव से जुड़े कार्यकर्ताओं तथा क्षेत्रवासियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि बाबा दयाल का प्रेम, करुणा और मानव सेवा का संदेश आगे भी जन-जन तक पहुंचाया जाता रहेगा।

